लाचित बोर्पुकन-एक गुमनाम योधा

सुनने में आता है मुगलों ने कभी असाम (अहोम राज्य) पर कब्ज़ा नही किया, पर 1 बार, 1661 में राजा जय्धव्ज़ सिंघा के समय में औरंगजेब, के दो सेनापतियो मीर जुमला और दिलेर खान के समय में अहोम राज्य को जीत लिया था और राजा जय्धव्ज़ सिंघा को औरंगजेब से संधी करनी पड़ी, जिसमे न सिर्फ राज्य मुगलों के आधीन हुआ, साथ में राजा की 6 वर्ष की बेटी को औरन्गज़ेब की हरम में देना पड़ा ।

इस सदमे से परेशान राजा जल्दी ही खत्म हो गए, उनके बाद वहाँ का राजा बना चक्रध्वज़ सिंघा ।
चक्रध्वज़ सिंघा, ने 1665 में लाचित बोर्पुकन को अपनी सेना का सेना पति बनाया ।

लाचित के मन अभी तक अहोम राज्य के मुग़ल के आधीन होने का गम, समाया हुआ था ।
लाचित ने बिना मुग़ल सल्तनत को पता चले, 4 साल तक अपनी सेना को शक्तिशाली बनाने का काम किया ।
और कहते है न की नेक काम में भगवान भी आपकी मदद के लिए तैयार रहता है ।

1667 में मुग़ल सल्तनत ने अपना असम का फौजदार बदला, नया फौज दार फ़िरोज़ खान, अपनी ऐयाशी के लिए जाना जाता था ।

उसने चक्रध्वज़ सिंघा को आदेश दिया की को अपने राज्य की लडकियों को उसके पास भेजे ।
इस से लाचित और अहोम राज्य के लोगो के गुस्से मे आग में घी का काम कर दिया ।
और लाचित की तैयार की हुई सेना ने, बाग हजारिका की अगुवाई में अपने गुरिल्ला युद्ध निति से मुगलों पर आक्रमण कर के घुवाहटी का किला जीत लिया ।

जब औरन्गज़ेब को पता चला तो उसने अपने 70000 सैनिको की फौज को लाचित से लड़ने भेजा ।
इस युद्ध में कड़ी टक्कर मिलने पर भी, लाचित ने अपना किला बचाए रखा ।
इस के बाद लाचित पूर्ण तरह बीमार पड़ गए और 1671 में मुग़ल सेना ने फिर से आक्रमण कर दिया, इस बार युद्ध ब्रह्मपुत्र नदी में लड़ा गया ।
जहा अहोम सेना कमजोर पड़ गई और लाचित को जब ये पता चला तो वो बीमार हालत में भी युद्ध करने के आ गए, जिसके चलते अहोम सेना युद्ध जीत गई, परन्तु युद्ध के कुछ समय बाद बीमारी के चलते लाचित मर्त्यु को प्राप्त हो गए ।

उसके बाद 1682 में फिर मुग़ल ने असम पर आक्रमण किया,परन्तु नकाम रही, जिस पर मुगलों को समझ आ गया की अहोम सेना को जीतना नामुमकिन है और फिर कभी मुगलों ने असाम की तरफ नज़र उठा कर नही देखा।

हममे से काफी लोग इस शूरवीर को नही जानते।

किसका कैलाश मानसरोवर

 

1962 से पहले कैलाश मानसरोवर भारत का हे हिस्सा था, जब तक चीन ने भारत पर हमला कर के उसे हतिया नही लिया ।

इस के लिए हम सभी नेहरु का दोषी ठहराते है, और वो थे भी, क्यों की प्रधान मंत्री तो वो ही थे तब ।

पर क्या पता है चाइना के पास इतनी हिम्मत आई कहा से की वो भारत पर हमला कर सके ।

असल में उस वक़्त भारत के एक महा मुर्ख रक्षा मंत्री थे वि. के. कृषण मेनन ।
जी हाँ मुर्ख ही नही महा मुर्ख, ये थे तो रक्षा मंत्री पर इन्हें, देश की रक्षा और सेना से कोई मतलब नही था ।
ये भारत में कम और विदेशो में ज्यादा रहते थे, इनकी काबिलियत बस यही थी की ये नेहरु के दोस्त थे और इस कारण ये रक्षा मंत्री बने वर्ना इनकी बातें सुन कर आप इन्हें अपने घर का नौकर भी न रखो ।
ये जनाब लोकसभा ये प्रस्ताव रखते थे की, अब भारत का कोई भी मुल्क दुश्मन नही है, तो हमे अपनी फौज हटा देनी चाहिए ।
जी बिलकुल, इनको महा मुर्ख ऐसे ही नही कहा मैंने, इनका कहना था चीन हमारा दोस्त है और पाकिस्तान से हमारे दुश्मनी, 1948 में ही खत्म हो गई , तो हम पर हमला ही कोन करेगा ।

इन महानुभाव ने न सिर्फ सेना में कटोती की बल्कि जो शस्त्र बनाने वाले कारखाने थे उन्हें भी बंद करवा दिया था, जिस से चीन समझ गया था की पड़ोस में मूर्खो की सरकार है, और उसने हमला कर दिया ।
इस हमले में भारत की न सिर्फ 72000 वर्ग मील ज़मीन गई बल्कि, लाखो लोगो की जान भी गई ।

हमले के बाद भी ये इतने सतर्क थे की हफ्ते भर तक तो इन्होने चीन की सेना का जवाब देने के लिए अपनी सेना ही नही भेजी ।
और नेहरु ने जब अमेरिका के कहने पर चीन से संधी की तो वो 72000 वर्ग ज़मीन उन्हें दान में देकर की ।
उसकी हारी हुई ज़मीन का हिस्सा था कैलाश मानसरोवर, जो तीर्थ तो हमारा है पर उस पर कब्ज़ा है चाइना का ।

और जब युद्ध हारने पर विपक्ष के महावीर त्यागीजी ने नेहरु से पुछा की ये ज़मीन वापस कब ली जाएगी, तो नेहरु का जवाब था की वो बंज़र ज़मीन थी, उस पर एक घास का तिनका भी नही होता था , क्या करेंगे उस ज़मीन का?

इतने महान थे हमारे चाचा नेहरु और उनके सिपेसलार ।

अजमेर रेप केस-सबसे घिनोना केस

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1992 का एक ऐसा रेप केस, जिसे जिसने भी सुना, दंग रह गया ।

आज से करीब 25 साल पहले, सोफिया गर्ल्स स्कूल अजमेर, में करीब 100 से ज्यादा लडकियों का रेप हुआ था, इन्हें ब्लैकमेल कर के किया गया था ये रेप ।

कांग्रेस यूथ लीडर फारूक चिस्ती, नफीस चिस्ती और अनवर चिस्ती, इस केस के मुख्य आरोपी थे ।

फारूक चिस्ती जो कांग्रेस यूथ का प्रेसिडेंट भी था, उसने पहले एक लड़की को बहला फुसला कर उसके साथ रेप किया, फिर उसकी न्यूड तस्वीरे निकली और उसे ब्लैकमेल कर के दूसरी लडकियों को फ़साने और उसके पास लेन को कहा ।

सिलसिला ऐसे ही शुरू हुआ, और वो मासूम स्कूल में पढने वाली लडकियों के साथ ये घिनोना करम होता रहा ।

इन तीन लोगो से शुरू हुआ ये गुनाह इतना बढ़ गया की इस में तस्वीरो के नेगेटिव साफ़ करने  वालो से लेकर लडकियों को फार्म हाउस तक लाने लेजाने वाले ड्राईवर तक सब शामिल हो गए और करीब 30 लोग इन मासूम लडकियों को बारी बारी से नोचते रहे ।

एक एक कर के लडकिया इनके फार्म हाउस पर आती और उनके साथ जबरन 20-30 लोग रेप करते ।

ये जुर्म यु ही तब तक चलता रहा, जब तक इन लडकियों में से 6 ने खुदखुसी नही कर ली ।

उसके बाद जब एक के बाद एक, एक ही स्कूल की लडकियों की खुदखुसी की खबर आने लगी, तो मामला सामने आया ।

पर फारूक चिस्ती, नफीस चिस्ती और अनवर चिस्ती, अजमेर दरगाह के कदीम के रिश्तेदार थे और कांग्रेस के नेता, तो मामला दबा दिया गया ।

लडकियों के घर वालो को और एक NGO जो इनकी मदद के लिए सामने आया था, उन्हें जान से मारने की धमकी मिलने लगी, तो सब पीछे हट गए, मीडिया ने भी इस केस को ज्यादा हाईलाइट नही किया ।

और 1998 तक इस केस में कोई सजा नही हुई, हाला की पुरषोत्तम नाम के एक आरोपी ने, 1994 में खुदखुसी कर ली ।

1998 में इनमे से 8-10 लोगो को आजीवन कारावास दिया, पर फारूक चिस्ती अपनी दिमागी हालत खराब बता कर बच निकला ।

इन में एक आरोपी सलीम जो 2012 में पकड़ा गया था, वो जमानत पर बहार गया और फिर गयाब हो गया ।

सत्ता और राजनेताओ का ऐसा रसुक था की, इस केस में मात्र 8 लोगो को सजा मिली, बाकी मुख्य आरोपी कहा गायब है, आज तक किसी को नही पता ।

 

 

जानिए वैश्या के रूप में देवी की कहानी

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अजीजन बाई

मध्य प्रदेश के एक क्षत्रीय कुल में जन्मी लड़की, जिसे कुछ अँगरेज़ उठा कर ले गए थे और अपनी छावनी में ले जाकर सबने उसके साथ रेप किया,बाद में कानपूर के कोठे पर बेच दिया।

जहाँ ये नृत्य किया करती थी, क्रन्तिकारी परिषद् के शमशुद्दीन का इन पर दिल आ गया था ।

और दोनों एक होने ही वाले थे की 1857 की क्रांति भड़क उठी और अजीजन बाई, जो एक कुलीन क्षत्रीय थी उसने, अपना पेशा छोड़ कर।

क्रांति की इस लड़ाई में ४०० वैश्याओ को साथ लेकर उतरना सही समझा।

अजीजन बाई और उनके दल की सभी महिलाओ का काम तोपों में बारूद भरना और बन्दूको और कारतूस डालने के साथ,घायल सैनिको का इलाज़ करना और उन्हें खाना भोजन मुहैया कराना था।

क्यों की अंग्रेजो का इन वैश्याओ के पास आना जाना था तो, इन्होने जासूसी का काम भी बखूबी किया।

बाद में ये सभी वैश्याए मर्दाने कपडे पहन कर और हाथो में तलवार लेकर खुले जंग में कूद गई थी।

जब ब्रिटिश की पकड़ जंग पर मज़बूत होती गई तो, एक अँगरेज़ अफसर ने उनके सामने ये प्रस्ताव रखा था की अगर वो हथियार छोड़ कर माफ़ी मांग ले तो उनके कोठे को और अच्छे तरह से सजा दिया जायेगा और उन्हें उपहार में हीरे मोतियों से भर दिया जायेगा। परन्तु उन्होंने उस अफसार को ना सिर्फ धुतकारा अपितु ये भी कहा की माफ़ी तो एक दिन अँगरेज़ मांगेगे भारतवासियों से।

जिससे सुन वो अफसार तिल मिल गया और उन्हें वही गोलियों से छलनी करा दिया।

ये दास्तान उस महान देवी की है, जो अंग्रेजो के अतियाचारो के कारण वैश्या तो बनी परन्तु देश भक्ति उसके अन्दर से अंतिम सास तक नही गई।

 

नमन है इस महान क्रांतिकारी देवी को।

 

।।रानी लक्ष्मी बाई को उनकी पुण्य तिथि पर नमन

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।।18 जून 1858 आज ही था वो एतिहासिक दिन ।।

।।रानी लक्ष्मी बाई को उनकी पुण्य तिथि पर नमन ।।

(भारत की गुलामी-4)

नाना साहब पेशवा , तात्या टोपे  और रानी लक्ष्मी बाई ने एक क्रांतिकारी परिषद् बनाई हुई थी।

और सारे देश में इस परिषद् के मेम्बर्स की संख्या 4 करोड़ से जयादा थी, इस परिषद् ने 31 मई 1857 को पूरे देश में एक साथ विरोध करने की योजना बनाई हुई थी, परन्तु 10 मई को हुए मेरठ के विरोध से ब्रिटिश सजग हो गए थे।

10 मई से 19 सितम्बर 1857 तक भारत के 300 से जयादा रियासत (जिले) अंग्रेजो के कब्ज़े से आजाद थे।

पर भारत में पल रहे देश द्रोही राजाओ की मदद से फिर से ब्रिटिश सरकार ने अपनी पकड़ मज़बूत करते हुए, इस विद्रोह को पस्त कर दिया था।

और जब क्रन्तिकारी परिषद् ने विद्रोह किया तो, अँगरेज़ ग्वालियर के जीवाजी राव सिंधिया की फौज को साथ लेकर, इसका विरिध करने लगे।

रानी लक्ष्मी बाई से ब्रिटिश का  ये युद्ध करीब साल भर चला जिसमे ब्रिटिश कभी झासी का किला नही जीत पाए।

दुर्भाग्य से 22 मई 1858 को सिंधिया की फौज के साथ ब्रिटिश अफसर HUE Rose झासी के किले में प्रवेश पा गया, जिस कारण लक्ष्मी बाई,  अपना किला छोड़ कर, कालपी होते हुए ग्वालियर की तरफ बढ़ गई और  तात्या टोपे के साथ उन्होंने सिंधिया के किले पर कब्ज़ा कर लिया।

वहाँ भी HUE Rose पहुच गया और रानी को वो किला भी छोड़ना पड़ा, रानी का एक घोडा था राज रतन जो अब रानी के पास नही था और नया घोडा इतना कुशल नही था जो एक नहर को कूद नही पाया, पीछे से ब्रिटिश फौज वह आ पहुची, जहा युद्ध के दौरान रानी लक्ष्मी बाई घयल हो गई और उनके विश्वास पात्र सैनिक उन्हें ग्वालियर के फूल बाघ में गंगा दस मठ में ले गए जहा रानी ने आज से सही 159 साल पहले 18 जून 1858 को अपने प्राण त्याग दिए और वही उनका अंतिम कर्म भी किया गया था। ऐसी वीरांगना रानी लक्ष्मी बाई को उनकी पुण्य तिथि पर नमन ।।

 

 

एक मंदिर जहा औरंगजेब का भी सर झुक गया

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राजस्थान के सीकर से ३० कम दूर एक मंदिर है जीण माता मंदिर ।
करीब 800-1000 साल पुराना मंदिर, जहा कभी 2 भाई बहिन हर्ष और जीण ने तपस्या की थी और वह मंदिर बन गया जीण माता मंदिर, साथ में भैरव स्थाली में हर्ष देव मंदिर ।
इस मंदिर के पीछे अलग अलग कहानी है , कहना मुश्किल है सत्य कोन सी है ।
कोई कहता है हर्ष की पत्नी से झगडे के बाद जीण माता यहाँ आ गई थी और फिर उन्हें मानाने हर्ष भी आ गया था ।
कोई कहता है की घांघू के राजा और एक अप्सरा की संतान है हर्ष और जीण माता, जिससे अप्सरा ने राजा से मत भेद होने के कारण, यहाँ पहाड़ी पर छोड़ दिया और खुद अपने लोक को चली गई ।
यहाँ एक परासर ब्राह्मण पुजारी थे, जिनके वंसज आज भी यहाँ पुजारी है, पर बटते हुए करीब १०० से ज्यादा परिवार हो गए है, जिनका साल में ३ दिन प्रति परिवार के हिसाब से मंदिर का चढ़ावा लेने का नंबर आता है ।
अब वो बात जिसके लिए पोस्ट की गई है ।
औरंगजेब ने किस तरह भारत के मंदिर को नस्ट किया ये सबको पता है, ऐसे ही एक बार औरंगजेब इस मंदिर को नस्ट करने अपनी सेना के साथ आया था ।
परन्तु हुआ कुछ ऐसा, जिसे चमत्कार कहो या इतिफाक ।
मधुमखियों के एक झुण्ड ने औरंगजेब की सेना पर हमला कर दिया, और क्या पैदल क्या घुड़सवार सब मैदान छोड़ कर भाग गए. ।
दुर्भाग्य से औरंगजेब भी इस सेना की टुकड़ी के साथ था और औरंगजेब का कुछ ऐसा हाल हुआ की वो महीनो तक बिस्तर से ना उठ सका, फिर किसी ने उससे माता को भेट सवरूप तेल चढाने की सलाह दी,
उसने ऐसा किया तब वो कही जाकर ठीक हुआ ।
और उसके बाद हर महीने माता के मंदिर में औरंगजेब की तरफ से तेल आने लगा जो सीधा दिल्ली से जाता था, फिर बाद में ये तेल जयपुर से जाने लगा और कई सौ वर्षो तक ये भेटका सिलसिला चलता रहा ।

अफगानिस्तान का इतिहास

अभी खबरे आ रही थी की भारत 15000 सैनिक अफगानिस्तान भेज रहा है ।
तो याद आया की महाभारत काल में कभी अफगान से भी भारत के हस्तिनापुर की रक्षा के लिए सेना आई थी ।
हस्तिनापुर के राजा संवरण पर जब सुदास ने आक्रमण किया तो संवरण की सहायता के लिए अफगानिस्तान से पठान लोग आये थे, विश्वास नही हुआ न ?
उस समय जिन्हें हम पस्थ कहा करते थे वो आज के पठानों है
ये जाट समुदाय के ही लोग होते है, “पस्थ कहो या पठान” और “पख्तून कहो या ‘पक्त्याकय” ।
ऋग्वेद के चौथे खंड के 44वें श्लोक में भी पख्तूनों का वर्णन पक्त्याकय’ नाम से मिलता है ।
और 91वें श्लोक जो ‘आपर्यतय’ नाम है वो आज का आफरीदी कबीला है ।
ये परिवर्तन स्वेछा से नही किया गया है ।
जब जब अफगानिस्तान वाले इलाके पर बाहरी आक्रमण होते गए है, तब तब ये परिवर्तन हुआ है ।
उस समय यहाँ अफगानिस्तान नही था , न ही यहाँ इस्लाम था ।
यहाँ कुभा या कुहका, गंधार, बाल्हीक, वोक्काण, कपिशा, मेरू, कम्बोज, पुरुषपुर (पेशावर), सुवास्तु, पुष्कलावती नमक राज्य हुआ करते थे, न की काबुल, कंधार, बल्ख, वाखान, बगराम, पामीर, बदख्शां, पेशावर, स्वात, चारसद्दा (जो अब है) ।
और
यहाँ जिन नदियों को आजकल हम आमू, काबुल, कुर्रम, रंगा, गोमल, हरिरुद नामों से जानते हैं, उन्हें प्राचीन भारतीय लोग वक्षु, कुभा, कुरम, रसा, गोमती, हर्यू या सर्यू के नाम से जानते थे।
इस से पहले यहाँ हिन्दू और बोध धर्म हुआ करते थे ।
ये लोग अपने की कनिष्क का वंसज मानते थे ।
अफगानिस्तान का जन्म तो 17 वि सताव्दी में हुआ है ।
लेकिन यहाँ का इतिहास बदला 1019 में जब महमूद गजनी से त्रिलोचनपाल को हराया ।
महमूद गजनी लूट के साथ साथ मंदिरों को नस्ट करता और लोगो को इस्लाम धर्म में जबरन परिवर्तित करता ।
अल-मसूदी और अल-मकदीसी जैसे इतिहासकारों की माने तो आज अफगानिस्तान की सारी आबादी कभी हिन्दू हुआ करती थी ।
यहाँ 6 माह गौतम बुध ने भी बिताये है, यहाँ की हिन्दू कुश पहाड़ी का नाम भगवान राम के पुत्र कुश के नाम पर रखा गया था, जो कभी यहाँ राज्य किया करते थे ।
आज जिस अफगानिस्तान में सबसे ज्यादा उत्पात और आतंक है, यहाँ कभी हिन्दू और बोध धर्म के समय शान्तिपिर्य लोग रहते थे ।
अगर भारत का 600-700 साल पुराना इतिहास पढोगे, तो बिना अफगान के भारत का इतिहास अधुरा है ।

भारतीय शिक्षा प्रणाली

बिहार बोर्ड का result आया, टोपर फर्जी निकला सबने बिहार बोर्ड पर सवाल उठाये, उनमे मैं भी था।
फिर उत्तर प्रदेश का दसवी का result आया, 5 लाख स्टूडेंट्स हिंदी में फ़ैल।
मुझे एक 11 साल पुराना एक रेप केस याद आया।
एक जर्मन महिला का 21 मार्च 2006 को अलवर में बिट्टी मोहंती के द्वारा किया गया रेप, याद है किसी को?
अब बोलोगे की इसका शिक्षा प्रणाली से क्या सम्बन्ध, तो चलो थोडा, इस केस पर नज़र डालते है।
जब ये हुआ,बिट्टी मोहंती के पिता I.P.S ऑफिसर थे।
केस क्लियर था तो जल्दी ही बिट्टी मोहंती को गिरफ्तार कर के 7 साल की सजा भी मिल गई।
फिर 1 दिन बिट्टी मोहंती की माँ की बीमारी का हवाला देते हुए, उसे पेरोले पर बाहर निकला और वो अंडरग्राउंड हो गया, अब बाप का रसूक था या क्या, पूरे भारत की पुलिस उसे न ढूढ़ पाई।
फिर सही 7 साल बाद, 9 मार्च 2013 को बिट्टी मोहंती केरला में मिला, जो नाम बदल कर स्टेट बैंक में P.O बन कर जॉब कर रहा था।
उसके पास नए नाम से डिग्री भी थी और पहचान पत्र भी और जाहिर है की ये डिग्रिया उसने खुद एग्जाम देकर तो नही हासिल की होंगी, फर्जी ही थी।
फर्जी भी क्यों, जब उस डिग्री के दम पर सरकारी बैंक में जॉब लग रही है, तो फर्जी कैसे?
अब सवाल की क्या खाली, टोपर फर्जी निकलने से ही उस प्रदेश का शिक्षा विभाग कटघरे में आता है, अगर टोपर फर्जी न निकला, तो बोर्ड बिलकुल सही ?
अब ये बता दू की बिट्टी मोहंती के सारे दस्तावेज़ आंद्र प्रदेश के थे।
मतलब हमाम में सब नंगे है। अगर किसी बोर्ड का टोपर फर्जी न निकले, तो हम उसे दूध का धुला नही मान सकते।
अब उत्तर प्रदेश जैसे हिंदी भाषी क्षेत्र में अगर 5 लाख स्टूडेंट्स हिंदी में फ़ैल हुए है।
तो गलती किसकी?
अब जाहिर सी बात है न तो प्रशन पत्र ही फारसी में पुछा गया होगा और न ही कॉपी चेक करने के लिए चाइना को आउटसोर्स किया होगा।
कोई कहे की उत्तर प्रदेश के 5 लाख बच्चो को हिंदी नही आती, तो विश्वास नही होगा
तो इस के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाए, बोर्ड को या उन अभिभावकों को जो हिंदी को हलके में लेकर, बाकी विषय पर ज्यादा ध्यान देने पर बच्चो को कहते है।

राम मदिर वही बनाएंगे

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अभी फेसबुक पर किसी का पोस्ट देखा।

उसमे लिखा था अयोध्या में “न मंदिर बनो या मस्जिद, वहा पर हॉस्पिटल बनवा देना चाहिए”।

आपकी इस सेक्युलर सोच को सलाम है बिलकुल हॉस्पिटल बनवाओ राम जन्म भूमि पर
बस 1 बात बता दो!

आने वाली पीढ़ी को क्या बताओगे?
भगवन श्री राम का जन्म यहा हुआ था।

कहा?

यहा इस हॉस्पिटल में ?

कमल करते हो साहब!!

पिछले 800-1000 सालो में क्या कम अपने इतिहास को दफनाया गया है।
इतने पुस्तकालय जलाये गए है, सिर्फ इस लिए की तुम अपने पूर्वजो को भूल जाओ और गुलामी की तरफ बढ़ो।

किताबो में जिनके बारे में पढना चाहिए, उनके बारे में सिर्फ 4 लाइन है और जिनको पूछना भी नही चाहिए, उनकी तारीफों के कसीदो की पूरी किताब है।

इतना कम है क्या,जो बची कुची कसर अब पूरा करना चाहते हो।

अगर अपना इतिहास नही समझोगे तो भविष्य नही बना पाओगे।
हमारा इतिहास (छत्रपति शिवाजी की जीवनी) पढ़ कर विएतनाम जैसे छोटे देश ने अमेरिका को युद्ध में हरा दिया था।

और 1 हम है, अपनी पहचान को खोने में हर संभव प्रयास कर रहे है।

।। जब महिलाओ ने अपनी चूड़ियाँ, पहनने को दे दी भारतीय सैनिको को ।।

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(भारत की गुलामी-3)

1857 का ग़दर सब ने सुना है, कैसे कारतूस में गाय, सुअर की चर्बी होने के कारण मंगल पाण्डेय ने बहरामपुर बंगाल में २ ब्रिटिश ऑफिसर्स को मार दिया और 8 अप्रैल 1857 को उन्हें फ़ासी दे दी गई।

उन्हें फ़ासी देने को जब बहरामपुर का कोई जल्लाद तैयार नही हुआ तो, कलकत्ता से ४ जल्लाद को बुलाया गया, इस फ़ासी की आवेज़ में उन्हें बहुत सारा धन, पेंशन और बच्चो को ईस्ट इंडिया कंपनी में नौकरी दी गई।

इस घटना के बाद बहरामपुर छावनी के 1000 भारतीय सनिको ने ब्रिटिश सरकार की नोकरी छोड़ दी, और  4-5  के समूह में पूरे भारत में बिखर गए, और भारतीयों को ब्रिटिश के खिलाफ उस्साने लगे।

इन्ही में से कुछ लोग पहुचे मेरठ की छावनी में, और वहा के सैनिको को चर्बी वाली बात बताई।

और 6 मई 1857 को मेरठ में 90 सैनिको ने ईस्ट इंडिया कंपनी की चर्बी वाली कारतूस को खोल कर चलाने से मना कर दिया।

इस से बौखलाई ब्रिटिश सरकार ने 9 मई 1857 को इन 80-90 सैनिको को निर्वस्त्र कर के परेड कराई गई।

कहानी अब शुरू होंती है।

2000 सैनिको की टुकड़ी में 90 को बेइज्ज़त किया और बाकी के सैनिक जब शाम को मेरठ के बाज़ार से गुज़रे, तो महिलाओ ने इन पर कटाक्ष किया, किसी ने नामर्द कहा, किसी ने कहा की जब तुमहरे साथियों को बेइज्ज़त किया जा रहा था, तब कहा गई थी वो मर्दंग्नी, कुछ महिलाओ ने अपनी चूड़ियाँ उतार कर इन्हें देदी पहनने के लिए।

इस अपमान को देख, अगले दिन 10 मई 1857 इतवार , जब सभी ब्रिटिश मेरठ छावनी में संत जॉन चर्च में सुबह 10 बजे इकठा हुए तो, इन 2000 सैनिको ने और आस पास के करीब 40 गाव वासियों ने उस चर्च को घेर कर आग लगा दी।

सैनिको के पास बंदूके थी, और गाव वालो के पास हसिया(चारा काटने वाला) जो ब्रिटिश चर्च सेनिक जान बचा कर बाहर निकले भी उन्हें वही काट दिया।

छावनी को अँगरेज़ रहित कर जब ये लोग, शहर में गए, और जहा जहा अंगेज़ मिले सबको काट दिया।

यहा तक की कुछ ब्रिटिश ऑफिसर्स, भारतीयों के घर में जा छुपे थे, शाम 6 बजे तक, 1-1 को ढूढ़ कर मार दिया था और 10 मई 1857 को मेरठ ब्रिटिश से आज़ाद हो गया था।

दिल्ली पर कब्ज़ा करने, ये लोग रात को ही दिल्ली निकल पड़े, और वहा लाल किले में गए,जब वहा के सैनिको को पता चला की मेरठ वासी ये काण्ड कर के आ रहे है, तो उन्हें गले से लगाया गया और उनका स्वागत हुआ।

फिर बहादुर शाह जफ़र को भी जबर्जस्ती इसमें शामिल कर के दिल्ली को 12 मई 1857 तक अँगरेज़ रहित करा दिया गया। इस विरोध में सिर्फ सैनिक हे नही थे, भारत की आम जनता भी थी, महिला और बच्चे भी थे।

और इस तरह ये लहर पूरे भारत में चली, और मात्र 15 दिनों में कई हज़ार ब्रिटिशों को मार दिया गया था । (फिर से भारत के गुलाम बनने की दास्तान फिर कभी….)

 

 

 

 

 

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