।। जब महिलाओ ने अपनी चूड़ियाँ, पहनने को दे दी भारतीय सैनिको को ।।

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(भारत की गुलामी-3)

1857 का ग़दर सब ने सुना है, कैसे कारतूस में गाय, सुअर की चर्बी होने के कारण मंगल पाण्डेय ने बहरामपुर बंगाल में २ ब्रिटिश ऑफिसर्स को मार दिया और 8 अप्रैल 1857 को उन्हें फ़ासी दे दी गई।

उन्हें फ़ासी देने को जब बहरामपुर का कोई जल्लाद तैयार नही हुआ तो, कलकत्ता से ४ जल्लाद को बुलाया गया, इस फ़ासी की आवेज़ में उन्हें बहुत सारा धन, पेंशन और बच्चो को ईस्ट इंडिया कंपनी में नौकरी दी गई।

इस घटना के बाद बहरामपुर छावनी के 1000 भारतीय सनिको ने ब्रिटिश सरकार की नोकरी छोड़ दी, और  4-5  के समूह में पूरे भारत में बिखर गए, और भारतीयों को ब्रिटिश के खिलाफ उस्साने लगे।

इन्ही में से कुछ लोग पहुचे मेरठ की छावनी में, और वहा के सैनिको को चर्बी वाली बात बताई।

और 6 मई 1857 को मेरठ में 90 सैनिको ने ईस्ट इंडिया कंपनी की चर्बी वाली कारतूस को खोल कर चलाने से मना कर दिया।

इस से बौखलाई ब्रिटिश सरकार ने 9 मई 1857 को इन 80-90 सैनिको को निर्वस्त्र कर के परेड कराई गई।

कहानी अब शुरू होंती है।

2000 सैनिको की टुकड़ी में 90 को बेइज्ज़त किया और बाकी के सैनिक जब शाम को मेरठ के बाज़ार से गुज़रे, तो महिलाओ ने इन पर कटाक्ष किया, किसी ने नामर्द कहा, किसी ने कहा की जब तुमहरे साथियों को बेइज्ज़त किया जा रहा था, तब कहा गई थी वो मर्दंग्नी, कुछ महिलाओ ने अपनी चूड़ियाँ उतार कर इन्हें देदी पहनने के लिए।

इस अपमान को देख, अगले दिन 10 मई 1857 इतवार , जब सभी ब्रिटिश मेरठ छावनी में संत जॉन चर्च में सुबह 10 बजे इकठा हुए तो, इन 2000 सैनिको ने और आस पास के करीब 40 गाव वासियों ने उस चर्च को घेर कर आग लगा दी।

सैनिको के पास बंदूके थी, और गाव वालो के पास हसिया(चारा काटने वाला) जो ब्रिटिश चर्च सेनिक जान बचा कर बाहर निकले भी उन्हें वही काट दिया।

छावनी को अँगरेज़ रहित कर जब ये लोग, शहर में गए, और जहा जहा अंगेज़ मिले सबको काट दिया।

यहा तक की कुछ ब्रिटिश ऑफिसर्स, भारतीयों के घर में जा छुपे थे, शाम 6 बजे तक, 1-1 को ढूढ़ कर मार दिया था और 10 मई 1857 को मेरठ ब्रिटिश से आज़ाद हो गया था।

दिल्ली पर कब्ज़ा करने, ये लोग रात को ही दिल्ली निकल पड़े, और वहा लाल किले में गए,जब वहा के सैनिको को पता चला की मेरठ वासी ये काण्ड कर के आ रहे है, तो उन्हें गले से लगाया गया और उनका स्वागत हुआ।

फिर बहादुर शाह जफ़र को भी जबर्जस्ती इसमें शामिल कर के दिल्ली को 12 मई 1857 तक अँगरेज़ रहित करा दिया गया। इस विरोध में सिर्फ सैनिक हे नही थे, भारत की आम जनता भी थी, महिला और बच्चे भी थे।

और इस तरह ये लहर पूरे भारत में चली, और मात्र 15 दिनों में कई हज़ार ब्रिटिशों को मार दिया गया था । (फिर से भारत के गुलाम बनने की दास्तान फिर कभी….)

 

 

 

 

 

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