अफगानिस्तान का इतिहास

अभी खबरे आ रही थी की भारत 15000 सैनिक अफगानिस्तान भेज रहा है ।
तो याद आया की महाभारत काल में कभी अफगान से भी भारत के हस्तिनापुर की रक्षा के लिए सेना आई थी ।
हस्तिनापुर के राजा संवरण पर जब सुदास ने आक्रमण किया तो संवरण की सहायता के लिए अफगानिस्तान से पठान लोग आये थे, विश्वास नही हुआ न ?
उस समय जिन्हें हम पस्थ कहा करते थे वो आज के पठानों है
ये जाट समुदाय के ही लोग होते है, “पस्थ कहो या पठान” और “पख्तून कहो या ‘पक्त्याकय” ।
ऋग्वेद के चौथे खंड के 44वें श्लोक में भी पख्तूनों का वर्णन पक्त्याकय’ नाम से मिलता है ।
और 91वें श्लोक जो ‘आपर्यतय’ नाम है वो आज का आफरीदी कबीला है ।
ये परिवर्तन स्वेछा से नही किया गया है ।
जब जब अफगानिस्तान वाले इलाके पर बाहरी आक्रमण होते गए है, तब तब ये परिवर्तन हुआ है ।
उस समय यहाँ अफगानिस्तान नही था , न ही यहाँ इस्लाम था ।
यहाँ कुभा या कुहका, गंधार, बाल्हीक, वोक्काण, कपिशा, मेरू, कम्बोज, पुरुषपुर (पेशावर), सुवास्तु, पुष्कलावती नमक राज्य हुआ करते थे, न की काबुल, कंधार, बल्ख, वाखान, बगराम, पामीर, बदख्शां, पेशावर, स्वात, चारसद्दा (जो अब है) ।
और
यहाँ जिन नदियों को आजकल हम आमू, काबुल, कुर्रम, रंगा, गोमल, हरिरुद नामों से जानते हैं, उन्हें प्राचीन भारतीय लोग वक्षु, कुभा, कुरम, रसा, गोमती, हर्यू या सर्यू के नाम से जानते थे।
इस से पहले यहाँ हिन्दू और बोध धर्म हुआ करते थे ।
ये लोग अपने की कनिष्क का वंसज मानते थे ।
अफगानिस्तान का जन्म तो 17 वि सताव्दी में हुआ है ।
लेकिन यहाँ का इतिहास बदला 1019 में जब महमूद गजनी से त्रिलोचनपाल को हराया ।
महमूद गजनी लूट के साथ साथ मंदिरों को नस्ट करता और लोगो को इस्लाम धर्म में जबरन परिवर्तित करता ।
अल-मसूदी और अल-मकदीसी जैसे इतिहासकारों की माने तो आज अफगानिस्तान की सारी आबादी कभी हिन्दू हुआ करती थी ।
यहाँ 6 माह गौतम बुध ने भी बिताये है, यहाँ की हिन्दू कुश पहाड़ी का नाम भगवान राम के पुत्र कुश के नाम पर रखा गया था, जो कभी यहाँ राज्य किया करते थे ।
आज जिस अफगानिस्तान में सबसे ज्यादा उत्पात और आतंक है, यहाँ कभी हिन्दू और बोध धर्म के समय शान्तिपिर्य लोग रहते थे ।
अगर भारत का 600-700 साल पुराना इतिहास पढोगे, तो बिना अफगान के भारत का इतिहास अधुरा है ।

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