।।रानी लक्ष्मी बाई को उनकी पुण्य तिथि पर नमन

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।।18 जून 1858 आज ही था वो एतिहासिक दिन ।।

।।रानी लक्ष्मी बाई को उनकी पुण्य तिथि पर नमन ।।

(भारत की गुलामी-4)

नाना साहब पेशवा , तात्या टोपे  और रानी लक्ष्मी बाई ने एक क्रांतिकारी परिषद् बनाई हुई थी।

और सारे देश में इस परिषद् के मेम्बर्स की संख्या 4 करोड़ से जयादा थी, इस परिषद् ने 31 मई 1857 को पूरे देश में एक साथ विरोध करने की योजना बनाई हुई थी, परन्तु 10 मई को हुए मेरठ के विरोध से ब्रिटिश सजग हो गए थे।

10 मई से 19 सितम्बर 1857 तक भारत के 300 से जयादा रियासत (जिले) अंग्रेजो के कब्ज़े से आजाद थे।

पर भारत में पल रहे देश द्रोही राजाओ की मदद से फिर से ब्रिटिश सरकार ने अपनी पकड़ मज़बूत करते हुए, इस विद्रोह को पस्त कर दिया था।

और जब क्रन्तिकारी परिषद् ने विद्रोह किया तो, अँगरेज़ ग्वालियर के जीवाजी राव सिंधिया की फौज को साथ लेकर, इसका विरिध करने लगे।

रानी लक्ष्मी बाई से ब्रिटिश का  ये युद्ध करीब साल भर चला जिसमे ब्रिटिश कभी झासी का किला नही जीत पाए।

दुर्भाग्य से 22 मई 1858 को सिंधिया की फौज के साथ ब्रिटिश अफसर HUE Rose झासी के किले में प्रवेश पा गया, जिस कारण लक्ष्मी बाई,  अपना किला छोड़ कर, कालपी होते हुए ग्वालियर की तरफ बढ़ गई और  तात्या टोपे के साथ उन्होंने सिंधिया के किले पर कब्ज़ा कर लिया।

वहाँ भी HUE Rose पहुच गया और रानी को वो किला भी छोड़ना पड़ा, रानी का एक घोडा था राज रतन जो अब रानी के पास नही था और नया घोडा इतना कुशल नही था जो एक नहर को कूद नही पाया, पीछे से ब्रिटिश फौज वह आ पहुची, जहा युद्ध के दौरान रानी लक्ष्मी बाई घयल हो गई और उनके विश्वास पात्र सैनिक उन्हें ग्वालियर के फूल बाघ में गंगा दस मठ में ले गए जहा रानी ने आज से सही 159 साल पहले 18 जून 1858 को अपने प्राण त्याग दिए और वही उनका अंतिम कर्म भी किया गया था। ऐसी वीरांगना रानी लक्ष्मी बाई को उनकी पुण्य तिथि पर नमन ।।

 

 

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