क्या मराठा है बलूचिस्तान के पूर्वज

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भारत और बलूचिस्तान का रिश्ता आज बहुत गहराता हुआ दिख रहा है।
पाकिस्तान के कब्ज़े में रहने वाला ये प्रान्त, भारत की तरफ आस भरी नज़रो से देखता हुआ नज़र आ रहा है।
दर्शल 11 अगस्त 1947 को ब्रिटेन से आज़ाद हुआ ये देश, कब पाकिस्तान की गिरफ्त में आ गया ये बलूच के लोग कभी समझ ही नही पाए।
4-5 छोटी छोटी रियासतों में बटे बलूच के कलाकत के सुल्तान की जिन्नाह से काफी अच्छी दोस्ती थी, और जिन्नाह एक नामी वकील थे, तो बलूच रियाशत के सुल्तानों ने जिनाह को अपना वकील बनाकर ब्रिटिश से आज़ादी लेने के लिए पैरवी करने को कहा।
और जिन्नाह ने ये कर भी दिखाया, उसके बाद, दोनों मुल्को ने आपस में रक्षा, दूरसंचार को लेकर कुछ समझोते भी किये, पर कुछ समय बाद ही जिन्नाह बलुच के सुल्तानों पर पाकिस्तान में विलय के दवाब बनाने लगा।
और एक दिन जिनाह ने कहा की कलाकत के सुलतान ने पाकिस्तान में विलय कर लिया है, जिस का ब्रिटेन के सामने दावा भी कर दिया।
पाकिस्तान ने मार्च 1948 में अपनी सेना भेज कर पूरे बलूचिस्तान पर कब्ज़ा कर लिया, बिलकुल उसी तरह जैसे उसने अपनी सेना को कश्मीर में भेजा था। और इस तरह सिर्फ 227 दिन ही आज़ाद रह पाया ये देश।
कश्मीर के राजा हरी सिंह की तरह ही, बलूच के सुल्तानों ने नेहरु को कहा था की वो बलूचिस्तान को भारत में मिला ले, जिसका जवाब नेहरु ने दिया था की भारत और बलूचिस्तान के बीच कोई ज़मीनी रास्ता नही है, तो नही हो सकता , इस का जवाब बलूच से आया था की ऐसा ज़मीनी रास्ता तो पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान(बांग्लादेश) में भी नही है, पर फिर भी वो एक देश है, इस पर भी चाचा ने फिर मना कर दिया था।
और न चाहते हुए भी बलूच पाक के कब्ज़े में आ गया, ये सबको पता है की वहां कई हजार बलुच नागरिको को पाकिस्तान की सेना हर साल घर से उठा कर लापता कर देती है, उनका mass murder भी आम बात है।
ऐसा नही है वहां सिर्फ मुस्लिम ही रहते हो।
एक फिल्म आई थी भारत में तिरंगा, राज कुमार और नाना पाटेकर की, जो यहाँ बहुत चली थी, क्यों की वो भारत की देश भक्ति पर आधारित थी।
पर बहुत कम लोगो को पता है की उस फिल्म को बलूचिस्तान में भी बड़े चाव से देखा गया था।
जिसके 2 कारण थे।
एक राज कुमार का एक बलूच ब्राह्मण परिवार में 1926 में पैदा होना,मतलब हिन्दुओ की आबादी भी थी वहां पर, पर राज कुमार की तो बहुत सी फिल्म आई थी फिर ये ही इतनी क्यों चली।
क्यों की सबसे अहम् कारण था, उस फिल्म में नाना पाटेकर द्वारा बोला गया एक डायलाग
“मराठा मरता है या मारता है” ।।
जी हाँ, बलूच के काफी लोग अपने को मराठा के वंसज मानते है, खासकर बुग्गती समुदाई के लोग,
और ये कहानी शुरू हुई थी आज से 256 साल पहले 1761 में, पानीपत की तीसरी लड़ाई में,
जब पेशवा का युद्ध अवध के नवाब सुजा उद दोला और अफ़ग़ान के नवाब अहमद शाह अब्दाली से हुआ था।
अब्दाली ख़ास अफगान से इस युद्ध के लिए बुलाया गया था और वो अपनी पूरी सेना के साथ आया था, साथ में अपने पडोसी बलूच के डेरा बुग्गती के नवाब की सेना की एक टुकड़ी भी लेकर आया था।
युद्ध हुआ, मराठा काफी संघर्ष करने पर भी कामयाब नही हुए, जिसके चलते करीब 22000 मराठी सैनिको को अब्दाली गिरफ्तार कर के पैदल ही अफ़ग़ान ले जाने लगा, इन्हें रास्ते में खाना और पानी नाम मात्र ही दिया गया, जिसके चलते ये बीमार हो चले थे।
अब जैसे ही अहमद शाह अब्दाली डेरा बुग्गती पहुचा, इन बीमार सैनिको से अपना पीछा छुड़ाने के लिए उसने ये 22000 सैनिक डेरा बुग्गती के नवाब को इनाम में दे दिया।
जहाँ इन्हें छोड़ा गया था, वहां कोई ज्यादा सुविधा नही थी, न ही खेती लायक ज़मीन थी, तो ये इधर उधर जहाँ इन्हें ज़मीन मिली वहां जाकर बस गए।
इनके वंसज आगे चल कर मुस्लिम तो बन गए पर वो आज भी अपने को मराठो की औलाद ही समझते है।

जिसके चलते इनका भारत से आज भी लगाव है।

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