भारत में जाती वाद का स्तर

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जातिवाद से मेरा वास्ता बहुत कम ही पड़ा है

12 क्लास तक मुझे जातीया तो समझ आती थी पर उसमे उंच नीच अगड़ा पिछला नही

12वि में जब कुछ मित्रो ने आरक्षण के आधार पर अपने भविष्य की नीव रखी तो कुछ कुछ समझ आया

पर जल्दी ही ये चैप्टर क्लोज हो गया, और इस विषय से मेरा नाता खत्म सा हो गया

फिर करीब 3 साल बाद अपने विध्यार्थी जीवन काल में ही मैंने, ब्रह्मा की नगरी पुष्कर जाने का इरादा किया

और दिल्ली से बस पकड़ कर पुष्कर पहुचा,वहाँ जाकर मैंने होटल में कमरा ढूँढना शुरू किया, और मुझे कमरा न मिला, और जहा मिला वह मेरी जेब ने जाने से मना कर दिया

पर शुक्र है, उस चाय वाले बुज़ुर्ग का जिसने, मुझे धर्मशाला जाने की सलाह दी

उसके बताये अनुसार में पुष्कर मेला मैदान के सामने की तरफ एक गली में चल निकला

पर मुझे नही पता था की ये अधबनी सी सड़क, मुझे मेरे जीवन का एक बहुत बड़े सबक सिखाने की राह है

आगे जाकर मुझे एक धर्मशाला मिली, और मैंने वहाँ एक कमरे के लिए पुछा,

सामने से सवाल आया

कोन सी जात है, मुझसे ये सवाल जीवन में पहली बार किसीने पुछा था

तो सकपकाना लाज़मी था, थोडा समहलकर मैंने गर्व से कहा ब्राह्मण

और सामने से जवाब आया, ये जाट धर्मशाला है, तुम यहाँ नही रुक सकते, आगे जाओ

बोलने वाले ने बड़े ही विनम्र और प्रेम पूर्वक ये बोला था

पर न जाने क्यों मुझे ये अपना अपमान सा लगा

और वहाँ से निकल कर मैं आगे चला गया, फिर एक धर्मशाला मिली,

वहाँ मैंने कमरे के लिए पुछा, फिर एक सवाल आया, क्या जात है

मैंने फिर ब्राह्मण कहा,

जवाब मिला की ये राजपूतो की धर्मशाला है,

अपने को एक उच्चजाती का समझने के गर्व को खील की तरह बिखरते हुए देख मैंने अपना और अपमान कराने से बेहतर, उसी शख्स से पूछ लिया, की फिर मुझे कहा जाना चाहिए और उसने मुझे बड़े प्रेम से एक धर्मशाला का पता बता दिया

वहाँ जाकर मुझे कमरा मिल गया

और हर चक्र पर चक चक करते पंखे के निचे और हर करवट पर कर कर करते पलंग के ऊपर मेरी रात कट तो गई

पर सुबह जब मैंने वहाँ ओपन बाथरूम का सिस्टम देखा तो और खुले में स्नान करने की सोची मतलब ब्रह्मसरोवर में जाकर स्नान करना बेहतर समझा

और बीती रात अपने साथ हुई जातिवाद की इस घटना को अपने आश्चर्य की सीमा समझते हुए मै ब्रह्मसरोवर की तरफ निकला

पर नही ये मेरे आश्चर्य की सीमा नही थी

जब मै ब्रह्म सरोवर पर गया तो मैंने वहाँ आलग अलग जाती और समुदाय के घाट देखे

एक सरोवर, एक ही जल फिर भी गुर्जर घाट अलग और गाऊ घाट (ब्राह्मण घाट) अलग

मुझे नही पता था, इस का कारण क्या था, वहाँ लोगो से पुछा भी तो जवाब मिला, फला रजा ने ये घाट बनवाया और फला रजा ने वो

अब इसे मै अपने आश्चर्य की सीमा समझते हुए, शाम को दिल्ली के लिए निकल पड़ा

पर नही ये भी मेरे आश्चर्य की सीमा नही थी, क्यों की जब मैंने अपने घर के बुजर्गो को इस के बारे में बताया तो उन्होंने मुझे जातिवाद के ऐसे ऐसे किस्से सुना दिए की यहाँ बोल दू तो क़यामत आ जाये

और यहाँ से मेरी इस विषय में रूचि बढ़ी

तब पता चला की जातिवाद सिर्फ वर्णों में ही नही बल्कि एक ही जाती में इतनी उप्जात् है की

ब्राह्मण होने पर भी मिसिर तेवारी के यहाँ रिश्ता नही करते,
पांडे ऊपधिया के यहाँ नही करते
राजकुमार ठाकुर, गौतम ठाकुर के यहाँ,
अस्थाना, श्रीवास्तव और अहिरो में,ग्वाल ढढोर के साथ भी कुछ ऐसा ही है

इस तरह जातिवाद, सनातन/हिन्दुवाद पर हावी है, की आज मुट्ठी भर हिंदूवादी बचे है

और कोसते है हम मनुवादिता के नाम पर मनाली के उस रजा मनु को जिसने समाज को कार्य के आधार पर सिर्फ ४ वर्णों में बाटा था

आज हमने उन 4 को बढ़ा कर 400 कर दिया है

कहाँ से लाते हो एक ही धर्म में इतनी विभिनता

ब्राह्मण, राजपूत,जाट के नाम पर इस कदर बटे पड़े हो

और बिगुल फूक कर बैठे हो उनके खिलाफ, जो बीफ खाने का विरोध करने पर काश्मीर से केरला और अटक(एक पाकिस्तानी शहर) से कटक तक एक हो जाते है

इसे देखकर मन करता है,की उन हिंदुवादियो से भी कह दू की,

“तुमसे न हो पायेगा”

और जाकर बधाई दे दू वामियो को की तुम बिना लड़े ही जंग  जीते बैठे हो

सोच लो एक होकर रहना है, कही इन 400 को भी 4000 बनाने  के चक्कर में डाइनासोर के प्रजाति में न पहुच जाना

हमारा क्या है हमे तो फिर तीरथराज पुष्कर का बुलावा आया है, इस बार होटल बुक करा कर जायेंगे

ताकि कोई फिर से न पूछ बैठे

“कोण जात स?”

 

 

 

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