भारत पाकिस्तान के बटवारे की अनसुनी सच्ची कहानी

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भारत और पाकिस्तान के बटवारे को लेकर, हम अक्सर नेहरु और जिनाह को दोषी मानते है।

पर असल बात ये है की पाकिस्तान बनाने की नीव बहुत पहले ही रखी जा चुकी थी।

और जिस शख्स ने ये काम किया था, वो और कोई नही अल्लामा इकबाल था।

जी इन्ही के लिखे हुए गाने

हम आज तक सांस्कृतिक कार्यक्रमों में गाते रहते है।

किसी ने नही सोचा होगा की

‘’सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान हमारा’’

और

‘’मजहब नही सिखाता आपस में बैर रखना’’

जैसे गाने लिखने वाला शख्स ही हिंदुस्तान को मजहब के नाम पर बाटने की साजिश करेगा।

1900 की शुरुवात में भारत में 2 टक्कर के गायक थे रबिन्द्र नाथ टैगोर और अल्लामा इकबाल

दोनों की ही ब्रिटिश सरकार में अच्छी खासी पैठ थी।

1913 में ब्रिटिश सरकार ने रबिन्द्रनाथ टैगोर को पुरस्कार दे दिया था जबकि प्रबल दावेदार अल्लामा इकबाल को माना जा रहा था।

इससे अल्लामा इकबाल को लगा की ब्रिटिश सरकार हिन्दुओ का पक्ष लेती है और जब 1919 में रबिन्द्रनाथ टैगोरे को दोबारा पुरस्कार मिला तो अल्लामा इकबाल के मन में एक अलग मुस्लिम देश बनाने की बात आ गई और उसने इस दिशा में प्रयाश शुरू कर दिए।

तभी 1920 में एक किताब आई रंगीला रसुल #Rangeelarasul, जैसा की नाम से पता चलता है इस किताब में मोहमद साहब के बारे में न लिखने योग्य बातें लिखी गई थी।

और मात्र 36 पन्नो की इस किताब ने हिन्दू मुस्लिम के बीच 36 का आकड़ा कर दिया।

एक मुस्लिम प्रकाशक द्वारा छापी गई ये किताब और हिन्दू लेखक द्वारा लिखी गई इस किताब पर मोलानाओ ने ज़हरीले भाषण देने शुरू कर दिए।

जिसने हिन्दू मुस्लिम के बीच की खाई को बाधा दिया।

और अलग मुल्क की बातें तेज़ हो गई।

जिस से प्रभावित होकर एक  18-19 साल के युवक इल्म उद दिन ने उस लेखक का कत्ल कर दिया।

अल्लामा इकबाल ने इसे मुस्लिमो का हीरो बना दिया था।

क्यों की ये एक दिहाड़ी मजदूर था और इस के पास कोई पैसा नही था तो।

अल्लामा इकबाल ने इस युवक का केस लड़ने को जिनाह को बोला था, क्यों की अल्लामा इकबाल जिनाह दोस्त थे, पर जिनाह जनता था की इस केस में दम नही है पर अल्लामा इकबाल ने जिनाह पर दवाव डाल कर ये केस लड़ने को कहा।

अल्लामा इकबाल ने कहा की ये केस लड़ने से जिनाह की छवि एक प्रखर मुस्लिम नेता की हो जाएगी

हलाकि जिनाह कोई मुस्लिम नेता नही था, उनका इस्लाम में भी ज्यदा विश्वास नही था, वो सुकर का मास खाना, शराब पीना जैसे गैर इस्लामिक काम भी करते थे।

पर जिनाह ने ये केस लड़ा और वो हार गए, ये वही केस है जो जिनाह की जीवनी में थे ओनली लॉस्ट केस #theonlylostcaseofjinaah के नाम से दर्ज है।

जिनाह ने अपने जीवन में बस यही एक केस हारा था, और 1929 में इल्म उद दिन को फ़ासी हो गई

पर इसके बाद जिनाह ने मुस्लिम लीग ज्वाइन की।

और वो मुस्लिमो के नेता कहे जाने लगे और इसी मुस्लिम लीग के ऑब्जेक्ट में एक अलग मुल्क पाकिस्तान बनाने की मांग शुरू हुई।

1938 में अल्लामा इकबाल की मृत्यू हो गई, पर ये मिशन चलता रहा और इसी के चलते, भारत और पाकिस्तान बने।

 

 

 

 

 

उधम सिंह के वंसज आज भी मजदूरी करते है

उम्मीद है आज भी जीत सिंह को बुलाया गया होगा, आखिर उसके दादा की बरषी जो है आज,
और अब तक तो वो अपने दिहाड़ी मजदूरी के लिए वापस भी निकल लिया होगा।
Rowlatt Act, जिसमे नागरिको के मूल अधिकारों को छीन लिया जाता है, के खिलाफ 1919 , अप्रैल 13,अमृतसर, जलियावाला बाघ में एक सभा हुई थी जिसमे 10-11 साल का एक बच्चा भी था।
जनरल डायर ने उस सभा में अन्धाधुन्ध गोलिया चलवाई और और हजारो लोगो की जान चली गई।
इस के एवज में ब्रिटिश सरकार ने डायर को प्रमोट कर के लन्दन भेज दिया था।
ये बच्चा अनाथ हो चला था, इसने डायर से बदला लेने की ठानी और 21 साल दिन रात मजदूरी कर के इसने लन्दन जाने का पैसा इकठ्ठा किया।
और आखिर 13 मार्च 1940 को इसने अपना बदला ले लिया।
सबको पता है शहीद उधम सिंह, ये बच्चा था।

पर आज इनके वंशज किस तरह मजदूरी कर के जी रहे है, ये किसी को नही पता, इनका पोते जीत सिंह और परपोते के पास आज दिहाड़ी मजदूरी के अलावा कोई रास्ता नही।
सरकारों ने उन्हें सहायता का वादा तो बहुत किया पर निभा न सकी।
अब ऐसे में किस मुह से देश श्रधांजलि दे, इस महान शहीद को।
ये कहानी अकेले उधम सिंह के परिवार की नही है।

चंद्रशेखर आज़ाद की माँ, आज़ादी के बाद एक वृधाश्रम में रहती थी और लकडिया बीन कर अपना जीवन चलाती थी, उनके मित्र सदाशिव को जब पता चला तो।
वो उन्हें अपने साथ झाँसी ले गए, 1951 में जब उनकी मृत्यू हुई तो झाँसी के लोगो ने उनकी एक मूर्ति लगाने की सोची।
जगह भी तय हो गई, मूर्ति भी तैयार थी पर सरकार को जैसे ही ये पता चला, तो इसका विरोध करते हुए, सरकार ने इस पर सदाशिव को देखते ही गोली मारते का आदेश देते हुए, उस मूर्ति को लगाने जाने वाली भीड़ पर लाठी चार्ज कर दिया।
सरकार किसकी थी ये बताने की जरुरत नही।
और अंत तक जिस शख्स ने पूरा देश आज़ाद कराने के लिए जान दी थी उसकी माँ को हम 2 फीट ज़मीन न दे सके।

ये तो वंसज थे, पर खुद बटुकेश्वर दत्त के साथ क्या हुआ था।
मात्र आज़ादी की 17 साल बाद, गरीबी में अपने जीवन काट रहे दत्त, जब पटना में एक बस परमिट लेने गए थे, तो वहां बैठे अफसर ने ये पूछ लिया था की वो क्रन्तिकारी है उसका कोई सबूत लाओ,
और अपने अंतिम दिनों में जब उन्हें कैंसर हो गया था और 1964 में उन्हें आनन् फानन में AIIMS लाया गया था, तो 3 दिन तक तो बेड भी नही दिया गया था।

ये सिर्फ 3 है, और ऐसे 22 शहीदों की सूचि है सरकार के पास जिनके वन्सज आज गरीबी में जी रहे है।

किस मुह से दे इन शहीदों को श्रधान्जली, समझ नही आता।

क्या मराठा है बलूचिस्तान के पूर्वज

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भारत और बलूचिस्तान का रिश्ता आज बहुत गहराता हुआ दिख रहा है।
पाकिस्तान के कब्ज़े में रहने वाला ये प्रान्त, भारत की तरफ आस भरी नज़रो से देखता हुआ नज़र आ रहा है।
दर्शल 11 अगस्त 1947 को ब्रिटेन से आज़ाद हुआ ये देश, कब पाकिस्तान की गिरफ्त में आ गया ये बलूच के लोग कभी समझ ही नही पाए।
4-5 छोटी छोटी रियासतों में बटे बलूच के कलाकत के सुल्तान की जिन्नाह से काफी अच्छी दोस्ती थी, और जिन्नाह एक नामी वकील थे, तो बलूच रियाशत के सुल्तानों ने जिनाह को अपना वकील बनाकर ब्रिटिश से आज़ादी लेने के लिए पैरवी करने को कहा।
और जिन्नाह ने ये कर भी दिखाया, उसके बाद, दोनों मुल्को ने आपस में रक्षा, दूरसंचार को लेकर कुछ समझोते भी किये, पर कुछ समय बाद ही जिन्नाह बलुच के सुल्तानों पर पाकिस्तान में विलय के दवाब बनाने लगा।
और एक दिन जिनाह ने कहा की कलाकत के सुलतान ने पाकिस्तान में विलय कर लिया है, जिस का ब्रिटेन के सामने दावा भी कर दिया।
पाकिस्तान ने मार्च 1948 में अपनी सेना भेज कर पूरे बलूचिस्तान पर कब्ज़ा कर लिया, बिलकुल उसी तरह जैसे उसने अपनी सेना को कश्मीर में भेजा था। और इस तरह सिर्फ 227 दिन ही आज़ाद रह पाया ये देश।
कश्मीर के राजा हरी सिंह की तरह ही, बलूच के सुल्तानों ने नेहरु को कहा था की वो बलूचिस्तान को भारत में मिला ले, जिसका जवाब नेहरु ने दिया था की भारत और बलूचिस्तान के बीच कोई ज़मीनी रास्ता नही है, तो नही हो सकता , इस का जवाब बलूच से आया था की ऐसा ज़मीनी रास्ता तो पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान(बांग्लादेश) में भी नही है, पर फिर भी वो एक देश है, इस पर भी चाचा ने फिर मना कर दिया था।
और न चाहते हुए भी बलूच पाक के कब्ज़े में आ गया, ये सबको पता है की वहां कई हजार बलुच नागरिको को पाकिस्तान की सेना हर साल घर से उठा कर लापता कर देती है, उनका mass murder भी आम बात है।
ऐसा नही है वहां सिर्फ मुस्लिम ही रहते हो।
एक फिल्म आई थी भारत में तिरंगा, राज कुमार और नाना पाटेकर की, जो यहाँ बहुत चली थी, क्यों की वो भारत की देश भक्ति पर आधारित थी।
पर बहुत कम लोगो को पता है की उस फिल्म को बलूचिस्तान में भी बड़े चाव से देखा गया था।
जिसके 2 कारण थे।
एक राज कुमार का एक बलूच ब्राह्मण परिवार में 1926 में पैदा होना,मतलब हिन्दुओ की आबादी भी थी वहां पर, पर राज कुमार की तो बहुत सी फिल्म आई थी फिर ये ही इतनी क्यों चली।
क्यों की सबसे अहम् कारण था, उस फिल्म में नाना पाटेकर द्वारा बोला गया एक डायलाग
“मराठा मरता है या मारता है” ।।
जी हाँ, बलूच के काफी लोग अपने को मराठा के वंसज मानते है, खासकर बुग्गती समुदाई के लोग,
और ये कहानी शुरू हुई थी आज से 256 साल पहले 1761 में, पानीपत की तीसरी लड़ाई में,
जब पेशवा का युद्ध अवध के नवाब सुजा उद दोला और अफ़ग़ान के नवाब अहमद शाह अब्दाली से हुआ था।
अब्दाली ख़ास अफगान से इस युद्ध के लिए बुलाया गया था और वो अपनी पूरी सेना के साथ आया था, साथ में अपने पडोसी बलूच के डेरा बुग्गती के नवाब की सेना की एक टुकड़ी भी लेकर आया था।
युद्ध हुआ, मराठा काफी संघर्ष करने पर भी कामयाब नही हुए, जिसके चलते करीब 22000 मराठी सैनिको को अब्दाली गिरफ्तार कर के पैदल ही अफ़ग़ान ले जाने लगा, इन्हें रास्ते में खाना और पानी नाम मात्र ही दिया गया, जिसके चलते ये बीमार हो चले थे।
अब जैसे ही अहमद शाह अब्दाली डेरा बुग्गती पहुचा, इन बीमार सैनिको से अपना पीछा छुड़ाने के लिए उसने ये 22000 सैनिक डेरा बुग्गती के नवाब को इनाम में दे दिया।
जहाँ इन्हें छोड़ा गया था, वहां कोई ज्यादा सुविधा नही थी, न ही खेती लायक ज़मीन थी, तो ये इधर उधर जहाँ इन्हें ज़मीन मिली वहां जाकर बस गए।
इनके वंसज आगे चल कर मुस्लिम तो बन गए पर वो आज भी अपने को मराठो की औलाद ही समझते है।

जिसके चलते इनका भारत से आज भी लगाव है।

भारत में -नवाज़ शरीफ के गाँव में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे

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अमृतसर के पास एक गाँव है, जटी उमरा ।
भारत के दुसरे गाँव की तरह ये कोई आम गाँव नही है, ये नवाज़ शरीफ का पैतृक गाँव है, जी पाकिस्तानी PM नवाज़ का ।
आज पनामा के चक्कर में नवाज़ की सरकार जाते देख इस गाँव के बारें में याद आया ।
और यहाँ के लोग नवाज़ परस्त कितने है ये आपको इस बात से पता चल जायेगा की अभी कुछ दिन पहले यहाँ पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगे थे ।
एक स्टूडेंट यूनियन गई थी यहाँ, नवाज़ शरीफ मुर्दाबाद के नारे लगाने, पर गाँव ने उन्हें मार पीट कर भगा दिया और जब उनसे पुछा गया की ऐसा क्यों किया ।
तब गाँव जटी उमरा के लोगो ने अपनी पाकिस्तानी परस्ती के बारे में बड़े गर्व से बताया,

“की क्यों न करें हम नवाज़ की तरफ दारी आखिर उसने 7 करोड़ rs. दिए है इस गाँव की पंचायत को, गाँव के हर घर को एक Iphone और जब भी यहाँ से कोई पाकिस्तान जाता है तो उससे वहां पहुचते ही गाडी मिल जाती है और 1 सोने की अंगूठी देकर विदा किया जाता है” ।

है न मज़ेदार, अब भला ऐसे में जब एक Iphone और और 1 सोने की अंगूठी, आपको आपके देश के खिलाफ खुले आम जाने के लिए काफी है, तो महाराज, राष्ट्रवाद की बातें करते सोचना पड़ता है ।
अब यु तो बहुत से पाकिस्तानियों के पैतृक गाँव भारत में है या कहो 70% पाकिस्तान ही अपनी जड़े भारत में छोड़ कर गया है ।
पर क्युकी नवाज़ एक सत्ता धारी है तो इस अकड़ में जटी उमरा के लोग खुल कर पाकिस्तान का समर्थन करते है ।
अब जब नवाज़ की सत्ता जाती है और शरीफ खानदान से अलग अगर कोई और पाक PM बनता है, तो जाहिर है इस गाँव की पाकिस्तान इतनी खातिरदारी नही करेगा, तब देखते है जटी उमरा के लोग पाकिस्तान परस्त रहेंगे या उन्हें एहसास होगा की भारत ही उनका देश है

कारगिल का सच

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पिछले ब्लॉग के बाद की दास्ताँ

पहले ये बता दूँ की, point 5353 है क्या, ये वो पहाड़ी है ,जिस पर से LOC होकर निकलती है, इसका आधा हिस्सा पाक का है और आधा भारत का, पर कारगिल के बाद भारत वाले हिस्से में कोई भारतीय चोकी नही है, मतलब अब पाक ही इस पहाड़ी पर अपनी पकड़ बनाये बैठा है।

अब बता दूँ की परमाणु परीक्षण के बाद भारत की स्तिथि कुछ वैसी हो गई थी जैसी आज पाकितान की है, बिलकुल isolated एक दम अलग थलग।

कोई भी देश भारत को सपोर्ट करने को तैयार नही था और जो करना चाहता था उसे US आँख दिखा देता था।

उस परिस्तिथि में अटलजी ने पूर्व प्रधानमंत्रियो की तरह ये कह कर की वो बंजर ज़मीन थी वहां होता ही क्या था बर्फ के अलावा, ज़मीन नही छोड़ी और युद्ध कर के विजय भारत के नाम की।

26 जुलाई 1999 को विजय दिवस घोषित हुआ, जब कारगिल शुरू हुआ था तब अटलजी ने नवाज़ से फ़ोन पर कहा था की, हम अमन की बात कर रहे है और तुम हमे ही धोका दे रहे हो, इस पर नवाज़ ने ये कहा था की नही कारगिल में पाकिस्तानी फौज नही है वहां कुछ आतंकी घुस चुके है, पाकिस्तान सरकार का इस में कोई रोले नही पर 29 जुलाई 1999, एक सफ़ेद झंडा लेकर पाकिस्तानी सेना वापस भारत कारगिल में आई और अपने सैनिको की लाश ले जाने लगी।

तब ये प्रमाणिक रूप से सिद्ध हो गया की इस में पाकिस्तानी सेना का सीधा हाथ था जिसके चलते नवाज़ ने मुसर्रफ़ पर ठीकरा फोड़ते हुए उसे सेना पद निकल दिया पर ये  उल्टा पड़ गया और मुसर्रफ़ ने तख्ता पलट कर दी।

अब कारगिल के दोरान परिस्तिथिया भारत के कितने विपरीत थी, ये आप लोग भारत में CIA की पकड़ से समझ सकते हो।

अगर पाकिस्तानी सेना ने वहां अपने हजारो जवान तैनात किये है और हथियार, उनके रहने खाने की व्यवस्था की है, मतलब साफ़ है की, कई सो बार हेलीकाप्टर का मूवमेंट वहां हुआ होगा

पर क्या भारत की किसी satellite ने उससे डिटेक्ट नही किया।

इस के 2 कारण हो सकते है।

  • या तो satellite ही बंद कर दी गई हो/ कराई गई हो।
  • या जानबुझ कर, इस मूवमेंट की सूचना इंटेलिजेंस को न दी गई हो।

इस से पता चलता है CIA की भारत में पकड़ का।

यहाँ तक भी सुना जाता है की उस के बाद CIA ने भारत में अटल सरकार को गिराने के लिए, पानी की तरह पैसा बहाया, पहले ताबूत घोटाला लगाया उस से काम नही चला तो NDA समर्थक दलों के घोटाले खोलने शुरू किये, जिसमे सबसे बड़ा असर पड़ा जयललिता पर, और उसने अटल सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया, इस तरह 13 महीने में अटल सरकार गिर गई।

यहाँ सोनिया गाँधी को समर्थन देकर प्रधानमंत्री बनाने की तयारी 1999 हो गई थी, यहाँ तक की सोनिया ने राष्ट्रपति को ज्ञापन सोप भी दिया था पर अंत समय में अपनी पटकनी देने की आदत से मजबूर मुलायम जी ने सोनिया से समर्थन वापस ले लिया और चुनाव करवा दिया।

जिसके चलते फिर अटल सरकार बनी और इस अटल सरकार ने विश्व स्तर पर भारत के एक द्रढ़ देश के रूप में उभरा।

विजय दिवस कारगिल

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मई 1998 में जब अटल सरकार ने पोखरण में परमाणु परीक्षण किया था तो सारा देश गर्व से फूला नही समां रहा था।
सही 2 वर्ष पूर्व जब अटलजी 13 दिन के लिए प्रधानमंत्री बने थे तब उन्होंने कहा था की अगर 13 दिन और सरकार चल जाती तो परमाणु परीक्षण कर देता, पर दुनिया ने ये चुनावी जुमला समझ कर अनसुना कर दिया।
पर अटल इरादे वाले अटल की सरकार जब दूसरी बार बनी तो 2 महीने से भी कम समय में अटलजी ने ये परीक्षण कर दिखाया और उस समय दुनिया को अटल की अटलता का एहसास हुआ।
पर इतना आसन नही था ये परीक्षण करना, क्यों की जब इसकी तैयारी शुरू हुई तो CIA को इस की खबर लग गई थी, और US ने अटल सरकार को मना किया था ये परीक्षण करने को, जिसे अनसुना कर के बेहद ही गोपनीय तरीके से परीक्षण किया गया था।
और इस को अपने अहम् पर ले चुके विश्व के शक्तिशाली देशो ने इसका विरोध करने में कोई कसर नही छोड़ी।
अब तक भारत को अपनी कटपुतली समझने वाले अमेरिका को अब ये हज़म नही हो रहा था।
तब उसने भारत को सबक सिखाने के लिए एक नया अध्याय शुरू किया, जिसका माध्यम बनाया पाकिस्तान को।
और यहाँ से शुरू हुई कारगिल को अंजाम देने की तैयारी, पैसा, हथियार, और हर संभव मदद पाकिस्तान को दान के नाम पर US के द्वारा दी गई और पूरे साजो सामान के साथ पाकिस्तान ने अपनी सेना को बर्फीले मौसम में भारत की सीमा में घुसा कर कारगिल पर कब्ज़ा कर लिया।
इस की पुष्टि, 3 मई 1999 को कुछ चरवाहों के द्वारा की गई और 5 मई से कारगिल युद्ध का आरम्भ हो गया।
आधुनिक हथियारों से लेस कारगिल में बैठी पाक आर्मी ने शुरुवात में भारत को बहुत नुक्सान पहुचाया,
भारत के कई शूरवीर और जाबाज़ शहीद भी हो गए।
बोफोर्स ने जवाब भी बहुत दिया, पर उचाई पर बैठा दुश्मन हाथ नही आ रहा था, और मदद पहुचने वाले NH-1, को पाक अपना निशाना बनाए बैठा था।
तब भारत ने अमेरिका से लेज़र गाइडेड मिसाइल मांगी, जिससे अमेरिका और रूस, तथा बाकी के सम्रध देश जो भारत के परमाणु परीक्षण से जले भुने बैठे थे, सबने देने से इनकार कर दिया।
इस पर इजराइल ने भारत को वो मिसाइल दी।
और भारत के सिपाहियों ने अपनी तोप और मिसाइल से नवाज़ शरीफ की सलवार में छेद करना शुरू कर दिया।
इस से घबराया नवाज़ फिर अपने आका US के चरणों में पसर कर अपनी इज्ज़त बचने की दुहाई मांगने लगा।
अब US भी समझ चूका था की युद्ध भारत के पक्ष में आ चूका है।
तब क्लिंटन ने अटलजी को आधी रात के समय, (तब US में दोपहर का समय था) को फ़ोन कर के युद्ध विराम करने को कहा और कारगिल की चोटियों पर बैठी पाक सेना को वापस जाने का रास्ता देने को भी बोला।
और अगले ही दिन सुबह सूरज निकलते ही युद्ध विराम हो गया था, पाकिस्तानी सेना ने 2 दिन का समय लिया वापस जाने में।
US नही चाहता था की भारत इस युद्ध पर अपनी जीत की मोहर लगाये इस लिए उसने भारत को एक पहाड़ Point 5353 नही लेने दिया पहले ही सीज फायर करा दिया और Point 5353 पहाड़ी आज भी पाकिस्तान के कब्ज़े में है।
जिसके चलते पाकिस्तान कारगिल युद्ध की जीत पर अपना दावा करता है और भारत तो आज विजय दिवस बना ही रहा है।
ये युद्ध 14 जुलाई के आस पास खत्म हो गया था, परन्तु इसकी सरकारी पुष्टि 26 जुलाई 1999 को हुई, और उस दिन कारगिल विजय दिवस बनाया गया।
इसके बाद की दास्तान बाद में, जो और भी अविश्वसनीय है।

।।आज विजय दिवस पर कारगिल शहीदों को नमन।।

भारत से डरा चीन

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कभी बिना बताये भारत में घुसपैठ करने वाला चीन, अब बस धमकियों से काम चला रहा है।
जिनपिंग का ब्यान आया है की
“भारत की फौज पहाड़ को हिला सकती है, पर चीन की फौज को नही’’।।
इस की पहली पंक्ति में खौफ से सरकती पेंट दिख रही है।
और दूसरी पंक्ति में उस पेंट को सम्हालने की कोशिश।
1962 में जो चीन, भारत में घुस आया था, वो आज रोज़ रोज़ ललकारने पर भी बगले झांक रहा है और कभी अपनी मीडिया और अब खुद ज़िन्ग्पिंग, रह रह कर बस धमकिय ही दे रहा है।
जब भी मैं चीन की घबराहट की बात करता हूँ, मेरे कुछ मित्र चीन की सेना, उसका श्त्रफाल और उसकी टेक्नोलॉजी का हवाला देकर कहने लगते है की चीन भारत से जीत पायेगा।
पर सत्य ये है की आज़ाद चीन की फौज बस आज तक जो युद्ध जीत सकी है,वो है बर्मा और भारत 1962 का युद्ध, और वो भी हमारे कुछ नेताओं द्वारा थाल में परोस के देने के बाद, वर्ना वियतनाम, ताइवान, कोरिया से और 1967 में भारत से भी युद्ध हारने वाली ये सेना, भले ही कितने आधुनिक हथियारों से लेस हो पर मनोबल में वो बिलकुल नाकारा है।
बाकी बची कुची कसर वहां की सरकार उन्हें सही समय पर वेतन न दे पाने के कारण, नौकरी से निकलने की धमकी देकर करती रहती है।

वफादारी में कांग्रेस जैसा कोई नही।

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वफादारी में कांग्रेस जैसा कोई नही।

मानो या न मानो कुकुर के बाद अगर किसी में सबसे ज्यादा वफादारी मिलेगी तो कांग्रेसियो में।
आज जब 31 साल बाद बोफोर्स की बात सामने आने लगी, तो उसमे फसते हुए उस समय के मुख्य सूत्रधार की पत्नी सोनिया गाँधी का नाम भी सामने आने के आसार है।

क्यों की राहुल गाँधी की तो मुछे भी नही आई होंगी उस समय, तो वो तो भाई साफ़ साफ़ बच गया यहाँ।
पर सोनिया को घिरते देख आज कांग्रेसियो ने जो संसाद में उत्पात मचाया है, वो कोई मामूली बात नही है, वो उनकी अपनी मैडम सोनिया के प्रति वफ़ादारी है।

अभी तो सिर्फ 6 संसाद 5 दिन के लिए बर्खास्त हुए है, अगर अपनी राजमाता को बचने के लिए सारी कांग्रेस को बर्खास्त भी होना पड़े तो वो खुशी ख़ुशी हो जायेंगे।
और अब जब स्वीडिश सरकार ने भी इस केस को रिओपेन करने की बात कही है तो,

राजमाता ने एक मीटिंग बुलाई है, जिसमे आगे इसी तरह संसाद में अवरूध पैदा करने, और उलटे सीधे बयानों तथा नए कांड कर के मीडिया को इस मुद्दे से भटकने की पट कथा लिखी जाएगी।

क्यों की कांग्रेस के लिए कभी नेहरु इज इंडिया एंड इंडिया इज़ नेहरु था।
फिर इंद्रा इज इंडिया एंड इंडिया इज इंद्रा हुआ।
और आज
इनके लिए,
सोनिया इज इंडिया एंड इंडिया इज सोनिया हो गया है।

किंमकर्ताव्यवीमुढा अवस्था में फसता चीन

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किंमकर्ताव्यवीमुढा अवस्था में फसता चीन, अब ये नही समझ पा रहा है की क्या बोले और क्या नही,
दुनिया के बड़े बड़े देशो ने भी उसके बयानों को संजीदगी से लेना बंद कर दिया है।
डोकलाम पर भारत का सख्त रुख देख कर, चीन बोल रहा है की इस मामले में हम किसी तीसरे देश कर हस्तक्षेप लेना पसंद करेंगे।
दर्शल चीन एक कुए की तरह है, उसने अपनी जनता को बहार की दुनिया के सच से अलग और बहार की दुनिया को अपनी जनता से अलग रखने की पूरी कोशिश सोशल मीडिया और गूगल को बेन कर के की हुई है।
शायद यही कारण है की वो आज तक भारत को 62 वाला भारत समझ कर उलझ पड़ा, पर अब ये उसे अपने गले की हड्डी सा बनता नज़र आ रहा है।
और जब भारत ने एक जोरदार टक्कर दी, तो चीन बगले झाकते हुए, कभी पाकिस्तान के जरिये कश्मीर में घुसने की बात करने लगा।
कभी पाकिस्तान से कश्मीर पर संधि करने की बात कर रहा है।
मात्र 2 दिन में कश्मीर मे हमला करने से लेकर कश्मीर पर संधि करने को उतारू चीन,
काफी कंफ्यूज सा लग रहा है।
फिर उसने भूटान डोकलाम पर कब्ज़े की धमकी देते हुए, भारतीय सेना को वहां से हटने को कहा,
जिसके जवाब में परसों गृह मंत्री ने, वहां और सेना भेजने को बोल दिया।
इधर चीन की इंटेलिजेंस का कहना है की, भारत पृथ्वी, जल, आकाश से चीन पर हमला करने को तैयार है
और भारत ने चीन के प्रमुख शहरो को अपनी मिसाइल की राडार पर लिया हुआ है।
अब चीन फिर से चुप होकर बैठ गया और समझ नही पा रहा ही इस परिस्थिति में भारत को किस और से घेरे।
कश्मीर और डोकलाम तो उसे न उम्मीद से लग रहे है।

इमाम बुखारी और चीन का कश्मीर राग

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इमाम बुखारी और चीन की कश्मीर समस्या को सुलझाने की कोशिश, ऐसे लग रही है जिसे चोर ने ही पंचायत बुला ली हो।

अभी कुछ दिन पहले ही चीन ने भारत और पाकिस्तान में संधि करने का ऑफर दिया था।

ये सोच कर की, इस से भारत कुछ नरम रुख अपनाएगा चीन के प्रति।

और भारत सरकार ने ये ऑफर कैपिटल में NO लिखकर ठुकरा दिया।

सही भी है  5 साल बाद जो देश दुनिया में नज़र भी नही आ रहा उस से संधि करनी ही क्या।

जिस दिन पाकिस्तान के आकाओं ने इसे चंदा देना बंद किया, उस दिन पाकिस्तान में एक गृह युद्ध होना तय है।

और ये युद्ध सिया सुनी, या किसी प्रान्त को लेकर नही होगा।

ये होगा एक दुसरे के घर माकन, ज़मीन जायदाद को छीन ने के लिए।

जिस पाकिस्तान का बजट विदेशी चंदो पर बन रहा हो, उससे संधि का लालच देकर चीन ने बता दिया है, की उसकी सरकारी मीडिया भले ही भारत के खिलाफ लम्बी लम्बी हाके पर, वो काफी डरा हुआ है।

उधर जमा मस्जिद के शाही इमाम बुखारी ने नवाज़ शरीफ को ख़त लिख कर हुर्रियत से बात करने को कहा है।

इन शाही इमाम के बारे में मैं जब भी सोचता हूँ, हंसी ही आती है।

आज तक मैं ये नही समझ पाया, की ये शाही शब्द क्यों लगते है अपने नाम के आगे।

न तो जामा मस्जिद कोई शाही मस्जिद है और न वहां इमाम चुन ने का तरीका किसी सरकारी प्रावधान से होता है।

ये तो पीढ़ी दर पीढ़ी अपने आप ही यहाँ इमाम बनते चले आ रहे है।

खैर इमाम साहब का पाकिस्तानी प्रेम जगजाहिर है, ये पहले भी ऐसा करते आये है।

पर इस बार इन्होने नवाज़ शरिफ्फ़ को अलगावादी नेताओ से बात करने को कहकर, अपना आतंकी प्रेम भी दिखा दिया है।

जिन्हें ये अलगावादी नेता बोल रहे है, दर्शल वो कभी रजिस्टर्ड आतंकी रह चुके है।

आज उन्होंने , फटा पयजमा छोड़ कर शेरवानी पहनली, बिखरे बल और दाढ़ी को करीने ने ट्रिम कर लिया, और बन्दूक छोड़ कर माइक पकड़ लिया है।

बस कुछ नही बदला तो ये, की कल तक जो आग इनकी बन्दूक से निकलती थी ,अब वो आग ये अपनी बोली से माइक में निकाल रहे है।

इन्ही लोगो से बात कर के नवाज़ शरीफ को कश्मीर समस्या का समाधान करने को उज्बेकितानी कोम बुखारा के इमाम बुखारी साहब ने कहा है।

बुखारी साहब आप ने ये चिट्टी लिख कर बस एक उड़ता तीर लिया है।

क्यों की आपके बिना कहे ही, इतने दिनों से तो पाकिस्तान ही इन अलगावादियों को पाल रहा था, उन्ही की बाते मान मान कर तो ये इतने सालो से कश्मीर में नाच रहे।

खैर ये पत्र लिख कर आपने अपना पाकिस्तानी प्रेम, भारत में अपना अविश्वास और भारत की सरकार से आपका डर साफ़ साफ़ जाहिर कर दिया है।